निसार मैं तेरी गलियों के अए वतन, कि जहाँ

निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ 

चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले 

जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले 

नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले

यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़ 
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई 
यूँ ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल 
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई 

                               By Faiz Ahmed Faiz

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